ठोस अवस्था(Solid State)
पदार्थ की वह अवस्था जिसमें अवयवी कण (जैसे परमाणु, अणु या आयन) एक प्रबल अंतराण्विक बलों द्वारा जालक में जुड़े होते हैं।
प्रबल बलों से जुड़े होने के कारण इनके कण गति करने में असमर्थ रहते हैं। इन पदार्थों के कण अपने अक्ष पर ही कंपन करते हैं। पदार्थों की इस अवस्था को ठोस अवस्था (solid state) कहते हैं। ठोस पदार्थ का आकार व आयतन निश्चित रहता है
ठोसों
के गुण
• इनका आयतन एवं आकार निश्चित होता है।
• इनके बीच अंतराण्विक बल लघु परास वाले होते हैं।
• इनके बीच प्रबल अंतराण्विक बल होते हैं।
• यह असंपीड्य तथा कठोर होते हैं।
• इनके अवयवी कणों की स्थिति निश्चित होती है।
• ठोस के अवयवी कण केवल अपने अक्ष पर ही कंपन करते हैं।
ठोस अवस्था के उदाहरण
• NaCl, KCl, MgCl2 आदि आयनिक ठोस
• O2 , CO2 , H2 आदि आण्विक ठोस
• डायमंड एवं ग्रेफाइट ये प्रबल सह संयोजक बंध से जुड़े होते हैं।
• सिल्वर(Ag), सोना(Au), लोहा(Fe), कॉपर(Cu), एल्युमिनियम(Al) आदि ठोस अवस्था के उदाहरण हैं।
ठोसों के प्रकार
ठोस दो प्रकार
के होते है
1. क्रिस्टलीय ठोस
2.
अक्रिस्टलीय ठोस
1.क्रस्टलीय ठोस (Crystalline Solid)
जिन ठोसों के अव्यवी (अणु, परमाणु, आयन) कण एक निश्चित ज्यामिति में व्यवस्थित होते हैं, क्रस्टलीय ठोस
कहलाते हैं। इन ठोसों के गलनांक निश्चित होते हैं अर्थात एक निश्चित ताप से अधिक
ऊष्मा देने पर ये द्रव में बदलने लगते हैं। क्रस्टलीय ठोस वास्तविक ठोस होते हैं। तथा
विषमदैशिक प्रकृति के होते हैं।
उदाहरण – NaCl , C12H22O11 , डायमंड , क्वार्ट्ज
, Au , Ag आदि
विषमदैशिकता– पदार्थों का ऐसा गुण जिसमें उनके भौतिक गुण
जैसे उष्मीय चलकता, विधुत चालकता, कठोरता तथा अपवर्तनांक आदि माप की विभिन्न दशाओं
में भिन्न भिन्न होते हैं, विषमदैशिकता कहलाता है।
2.अक्रिस्टलीय
ठोस (Amorphous
solids)
जिन ठोसों के अव्यवी (अणु, परमाणु, आयन) कण एक निश्चित ज्यामिति में व्यवस्थित नहीं होते हैं, अक्रस्टलीय ठोस कहलाते हैं। इन ठोसों
के गलनांक निश्चित नहीं होते हैं। अधिक ताप पर ये द्रव अवस्था में बदलने लगते हैं।
अत: ये वास्तिविक ठोस से भिन्न होते हैं। और समदैशिक होते
हैं।
उदाहरण – प्लास्टिक , कांच , रबर , मोम आदि।
समदैशिकता– पदार्थों का ऐसा
गुण जिसमें उनके भौतिक गुण जैसे उष्मीय चलकता, विधुत चालकता, कठोरता तथा अपवर्तनांक
आदि माप की विभिन्न दशाओं में समान होते हैं, समदैशिकता कहलाता है।
क्रिस्टलीय ठोसों का वर्गीकरण(Classification
of Crystalline)–
क्रिस्टलीय
ठोसों को उनके अंतराण्विक बलों के आधार पर चार भागों में बाँटा जा सकता है। ये
हैं:
1. आण्विक ठोस (Molecular Solids)
2. आयनिक ठोस (Ionic
solids)
3. धात्विक ठोस (Metallic
solids)
4. सहसंयोजक ठोस (Covalent
or Network solids)।
1. आण्विक ठोस (Molecular
Solids)
ऐसे क्रिस्टलीय ठोस जिनके
अवयवी कण परमाणु या अणु (Molecule) होते हैं, और
ये परमाणु या अणु दुर्बल वांडरवाल्स बलों से जुड़े होते हैं। उनको आण्विक ठोस (Molecular Solid) कहा जाता
है। इनके गलनांक निम्न होते हैं। यह विधुत के कुचालक होते हैं।
आण्विक ठोसों को तीन भागों
में बांटा गया है
ध्रुवीय आण्विक ठोस, अध्रुवीय
आण्विक ठोस, हाइड्रोजन आबंधित आण्विक ठोस।
उदाहरण – ठोस SO2 तथा HCl ध्रुवीय ठोस
ठोस H2 , Iodine I2 , आर्गन, CO2 आदि आध्रुवीय आण्विक ठोस हैं।
H2O तथा NH3 हाइड्रोजन
आबंधित आण्विक ठोस हैं।
2. आयनिक ठोस (Ionic Solid)
इसमें अवयवी कण आयन होते हैं । यह आयन प्रबल विद्युत
स्थैतिक बल से बंधे होते हैं इन्हें आयनिक ठोस (ionic solid ) कहते हैं । यह ठोस कठोर होते हैं । आयनिक ठोस के
गलनांक तथा क्वथनांक ऊंचे होते हैं । यह ठोस विद्युत के कुचालक होते हैं । अर्थात इनमें
विद्युत धारा का संचालन नहीं होता है लेकिन गलित अवस्था में यह विद्युत का संचालन करते
हैं ।
उदाहरण NaCl , KCI , LiF , KNO3 तथा CaO आदि आयनिक ठोस के उदाहरण हैं।
3. धात्विक ठोस (Metallic
Solid)
वह ठोस जो विद्युत के सुचालक होते हैं एवं जिनमें
आघातवर्धनीय और तन्यता का गुण पाया जाता है । उन्हें धात्विक ठोस ( metallic
solid ) कहते हैं । इन ठोस में विद्युत चालकता , चमक , रंग आदि गुण इनमें
विद्यमान मुक्त इलेक्ट्रॉनों के कारण होता है । यह अत्यधिक कठोर होते हैं ।
उदाहरण – एल्यूमिनियम ( AI ) , लोहा ( Fe ) , कॉपर ( Cu ) , सोना ( Au ) , चांदी ( Ag ) एवं मिश्रधातु पीतल
, कांसा आदि धात्विक ठोस के उदाहरण हैं ।
4. सहसंयोजक ठोस (Covalent
Solid)
अधात्विक क्रिस्टलीय ठोसों
में निकटवर्ती परमाणुओं के मध्य बहुत अधिक प्रबल सहसंयोजक बंध होते हैं । इस प्रकार
के ठोस को सहसंयोजक ठोस ( covalent
solid ) कहते हैं । इनके गलनांक अत्यधिक ऊंचे होते हैं। एवं यह ऊष्मा
तथा विद्युत के दुर्बल चालक होते हैं। गलित अवस्था में विद्युत के सुचालक होते हैं
।
उदाहरण– हीरा , क्वार्ट्ज , सिलिकॉन
आदि सहसंयोजक ठोस के उदाहरण हैं ।
एकक कोष्ठिका (Unit Cell)
क्रिस्टल जालक की वह छोटी से छोटी इकाई जिसके बार बार दोहराने से संपूर्ण क्रिस्टल का निर्माण होता है । उसे एकक कोष्ठिका ( unit cell ) कहते हैं । इसे इकाई सेल भी कहते हैं।
एकक कोष्ठीका के प्रकार
(Types of Unit Cell)
एकक कोष्ठिक दो प्रकार की होती है
1. आद्य एकक कोष्ठिका (Primitive
Unit Cell)
2.
केंद्रीय एकक कोष्ठोका (Centered Unit Cell)
1. आद्य एकक कोष्ठिका (Primitive Unit Cell)
वह एकक कोष्ठिका जिसके अव्यवि कण केवल किनारों पर उपस्थित होते हैं, उसे आद्य एकक कोष्ठिका कहते हैं।
2. केंद्रीय एकक कोष्ठिका (Centered Unit Cell)
वह एकक
कोष्ठिका जिसके अव्यवि कण किनारों के साथ साथ अन्य स्थानों पर भी उपस्थित होते
हैं। केंद्रीय एकक कोष्ठिका कहलाती है।
यह तीन प्रकार की होती है।
a. अंत: केंद्रीय एकक कोष्ठिका(Body Centered Unit Cell) (bcc)
वह एकक कोष्ठिका जिसके अव्यवि कण किनारों के अलावा उसके केंद्र पर भी स्थित होते हैं, अंत: केंद्रीय एकक कोष्ठिका कहते हैं।
b. फलक केंद्रीय एकक कोष्ठिका(Face Centered Unit Cell) (fcc)
वह एकक कोष्ठिका जिसमें अव्यवि कण किनारों के अतिरिक्त कोष्ठिका के प्रत्येक फलक के केंद्र पर भी उपस्थित होते हैं, उसे फलक केंद्रीय एकक कोष्ठिका कहते हैं।
c. अंत्य केंद्रीय एकक कोष्ठिका (End Centered Unit Cell) (ecc)
वह एकक कोष्ठिका जिसमें अव्यवी कण किनारों के साथ साथ किन्हीं दो विपरीत फलकों के केंद्र पर भी स्थित होते हैं, उसे अंत्य केंद्रीय एकक कोष्ठिका कहते हैं।
किसी
क्रिस्टल की नियमित 3D संरचना को क्रिस्टल
जालक कहते हैं। एक क्रिस्टल जालक में 8 कोर, 6 फलक, तथा 18 कोने
होते हैं।


2 Comments
Great
ReplyDeleteVery nice
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